करतारपुर साहिब: जहां श्री गुरु नानक देव ने सिखों को किया था एकजुट, जानें बंटवारे से लेकर अब तक क्या हुआ
जालंधर। सिखों के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी ने करतारपुर साहिब में ही सिख समुदाय को एकजुट किया था। श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारे की नींव उन्होंने स्वयं संवत् 1522 में रखी थी। यहीं से लंगर प्रथा की शुरुआत की थी। 1539 में ज्योति जोत समाने तक वह 18 साल यहां रहे थे। यहीं पर उन्होंने 'किरत करो, नाम जपो, वंड छको' (नाम जपें, मेहनत करें और बांटकर खाएं) का उपदेश दिया।
गुरु नानक देव जी के आने से पहले यहां की जमीन उपजाऊ नहीं थी। दुनी चंद नामक व्यक्ति ने सौ एकड़ जमीन उन्हें खेती के लिए दे दी। गुरु जी ने यहां खेती की तो फसलें लहलहाने लगीं और पैदावार काफी बढ़ गई। इसी अनाज से उन्होंने लंगर शुरू किया।
बताते हैं कि उनके उपदेशों से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें गुरु का दर्जा दे दिया। गुरुद्वारा परिसर में तीन कुएं हैं। एक कुआं अंदर है जिसके बारे में माना जाता है कि यह गुरु नानक देव जी के समय से है। इस कुएं को लेकर श्रद्धालुओं में अगाध श्रद्धाभाव है। इसके पास ही एक बम का टुकड़ा भी सहेजकर शीशे में रखा गया है। बताया जाता है कि 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय यह बम कुएं में गिरा था और इस कारण यह इलाका तबाह होने से बच गया था।